“Everybody is a genius. But if you judge a fish by its ability to climb a tree, it will live its whole life believing that it is stupid.”
— Albert Einstein
“He who fears he will suffer, already suffers because he fears.”
— Michel De Montaigne
“We think sometimes that poverty is only being hungry, naked and homeless. The poverty of being unwanted, unloved and uncared for is the greatest poverty.”
— Mother Theresa
“In seeking happiness for others, you will find it in yourself.”
“Yesterday is history, tomorrow is a mystery, today is a gift of God, which is why we call it the present.”
— Bill Keane
“Most people do not listen with the intent to understand; they listen with the intent to reply.”
— Stephen Covey
The way to get started is to quit talking and begin doing.
-Walt Disney
Tell me and I forget. Teach me and I remember. Involve me and I learn.
-Benjamin Franklin


बेगम हज़रत महल

सन 1801 में अवध के तत्कालीन नवाब शआदत अली खां ने लार्ड वेलेजली द्वारा आरम्भ की गयी सहायक संधि पर हस्ताक्षर कर स्वयं को पंगु बना लिया था. परोक्ष रूप से अवध पर अंग्रेजो का अधिकार स्थापित हो गया था. सन 1847 में वजीत अली शाह अवध की गद्दी पर बैठे. बेगम हजरत महल वाजिद अली शाह की पत्नी थी. वाजिद अली शाह ने गद्दी सँभालते ही सामाजिक और सैनिक सुधार लागू करना शुरू कर दिया.

 

यह बात अंग्रेजो को खटक रही थी कि नवाब वाजिद अली शाह साम्राज्य के प्रशासन में उनका हस्तक्षेप पसंद नहीं कर रहे है. नवाब पर कुशासन और अकर्मण्यता का आरोप लगाकर डलहौजी ने सन 1856 में नवाब को कोलकाता में नजरबन्द कर दिया और अवध साम्राज्य को अपने अधीन कर लिया. अवध के लोगो की नवाब के प्रति गहरी निष्ठा थी, लेकिन कुशल नेतृत्व के अभाव में वे तमाशायी बनकर रह गये.

 

इसी समय सम्पूर्ण भारत में अंग्रेजो के अन्याय, दमन और शोषण की नीति के विरुद्ध प्रतिशोध बढ़ रहा था. मेरठ, दिल्ली, अलीगढ, मैनपुरी, एटा और बरेली आदि स्थानों पर स्वतंत्रता संग्राम आरम्भ हो चूका था. लखनऊ के विद्रोह की शुरुआत 30 मई सन 1857 को मानी जाती है.

 

लखनऊ में विद्रोह प्रारंभ होने के साथ ही अवध के अंतर्गत आने वाले तमाम क्षेत्रों जैसे सीतापुर, मुहम्मदी, सिकरौरा, गोंडा, बहराइच, फ़ैजाबाद, सुल्तानपुर, सलोन और बेगमगंज को अंग्रेजो की अधीनता से मुक्त करा लिया गया. केवल राजधानी लखनऊ पर ही अंग्रेजो का कब्ज़ा था. 30 जून को चिनहट में अंग्रेज बुरी तरह से पराजित हुए और सभी अंग्रेजो ने लखनऊ की रेजीडेंसी में शरण ली.

 

इसी बीच नवाब वाजिद अली शाह के उत्तराधिकारी के रूप में बेगम हजरत महल के अवयस्क पुत्र बिरजीस कद्र को अवध का नवाब घोषित किया गया. बेगम हजरत महल उनकी संरक्षिका बनी.

 

राजकाज के निर्णय में भी बेगम के महत्व को स्वीकार किया गया. बड़े – बड़े ओहदों पर योग्य अधिकारी नियुक्त किये गये. सीमित संसाधनों और विषम परिस्थितयों के बावजूद बेगम हजरत महल लोगो में उत्साह भरती रही. उन्होंने विभिन्न इलाको के उच्चधिकारियों और सामन्तो को संगठित किया. बेगम ने स्त्रियों का एक सैनिक संगठन बनाया और कुछ कुशल स्त्रियों को जासूसी के काम में भी लगाया. महिला सैनिको ने महल की रक्षा के लिए अपने प्राण अर्पित कर दिए.

 

अंग्रेज सैनिक लगातार रेजीडेंसी से अपने साथियों को मुक्त कराने के लिए प्रयासरत रहे, लेकिन भारी विरोध के कारण अंग्रेजो को लखनऊ सेना भेजना कठिन हो गया था. इधर रेजीडेंसी पर विद्रोहियों द्वारा बराबर हमले किये जा रहे थे. बेगम हजरत महल लखनऊ के विभिन्न क्षेत्रो में घूम – घूम कर लोगो का उत्साह बढ़ा रही थी.

 
 

 

लेकिन होनी को कौन टाल सकता है. दिल्ली पर अंग्रेजो का अधिकार स्थापित हो चुका था. मुग़ल सम्राट बहादुर शाह जफ़र के बंदी होते ही क्रांतकारी विद्रोहियों के हौसले कमजोर पड़ने लगे. लखनऊ भी धीरे – धीरे अंग्रेजो के नियंत्रण में आने लगा था. हैवलाक और आउट्रूम की सेनाएं लखनऊ पहुँच गयी. बेगम हजरत महल ने कैसरबाग के दरवाजे पर ताले लटकवा दिए. अंग्रेजी सेनाओ ने बेलीगारद पर अधिकार कर लिया. बेगम ने अपने सिपाहियों में जोश भरते हुए कहा ,” अब सब कुछ बलिदान करने का समय आ गया है.

 

अंग्रेजो की सेना का अफसर हैवलाक आलमबाग तक पहुँच चूका था. कैम्पवेल भी कुछ और सेनाओ के साथ उससे जा मिला. आलमबाग में बहुत भीड़ इकट्ठी थी. जनता के साथ महल के सैनिक, नगर की सुरक्षा के लिए उमड़ पड़े थे. घनघोर बारिश हो रही थी. दोनों ओर से तोपों की भीषण मार चल रही थी. बेगम हजरत महल को चैन नहीं था.

वे चारो ओर घूम – घूम कर सरदारों में जोश भर रही थी. उनकी प्रेरणा ने क्रांतकारी विद्रोहियों में अद्भुत उत्साह का संचार किया. वे भूख प्यास सबकुछ भूलकर अपनी एक – एक इंच भूमि के लिए मर – मिटने को तैयार थे.

 

अंततः अंग्रेजो ने रेजीडेंसी में बंद अंग्रेज परिवारों को मुक्त कराने में सफलता प्राप्त कर ली, मार्च 1858 में अंग्रेजो का लखनऊ पर अधिकार हो गया. लखनऊ पर अधिकार के पश्चात बेगम हजरत महल अपने पुत्र बीरजीस कद्र के साथ नेपाल चली गयी. नेपाल के राजा राणा जंगबहादुर ने प्रारंभ में बेगम हजरत महल को शरण देने में असमर्थता व्यक्त की.

लेकिन बेगम के स्वाभिमान से प्रभावित होकर राणा ने उन्हें नेपाल में रहने की जगह दिलाई. वे काठमांडू में साधारण जीवन यापन करने लगी. उन्होंने अंग्रेजो के मान – सम्मान और पेंशन देने के प्रस्ताव को ठुकराते हुए नेपाल में ही रहने में अपना गौरव समझा.

 

बेगम हजरत महल का व्यक्तित्व भारत के नारी समाज का प्रतिनिधित्व करता है. वे अत्यधिक सुन्दर, दयालु और निर्भीक महिला थी. अवध की सम्पूर्ण प्रजा, अधिकारी तथा सैनिक उनका आदर करते थे.

 

क्रांतकारियों के सरदार दलपत सिंह महल में पहुँचते ही बोले – ” बेगम हुजूर, आपसे एक इल्तजा करने आया हूँ. वह क्या ? बेगम ने पूछा. आप अपने कैदी फिरंगियों को मुझे सौंप दीजिये. मैं उसमें से एक एक का हाथ पैर काटकर अंग्रेजो की छावनी में भेजूंगा. बात पूरी करते – करते दलपत सिंह का चेहरा भयंकर हो उठा.

नहीं हरगिज नहीं. बेगम के लहजे में कठोरता आ गयी- हम कैदियों के साथ ऐसा सलूक न तो खुद कर सकते है और न किसी को इसकी इजाजत दे सकते है. कैदियों पर जुल्म ढाने का रिवाज हमारे हिन्दुस्तान में नहीं है. हमारे जीते जी फिरंगी कैदियों व उनकी औरतो पर जुल्म कभी नहीं होगा.

 

सन 1874 में भारतीय क्रांति की यह क्रान्तिमयी तारिका इस जगत से विदा हो गयी. बेगम हजरत महल ने जिन विपत्तियों व विषम परिस्थितयो में साहस, धैर्य और आत्मसम्मान के साथ अपने कर्तव्य का निर्वाह किया वह हमारे लिए सदैव प्रेरणा बना रहेगा.

 

बेगम हजरत महल आज भले ही हमारे बीच में न हो पर उनका यह सन्देश हम भारतवासियों के लिए आज भी प्रासंगिक है – यह हिन्द की पाक पवित्र सरजमीं है. यहाँ जब कोई भी जंग छिड़ी है, हमेशा जुल्म करने वाले जालिम की ही शिकस्त हुई है. यह मेरा पक्का यकींन है. बेकसों, मजलमो का खून बहाने वाला यहाँ कभी अपने गंदे ख्वाबो के महल नहीं खड़ा कर सकेगा. आने वाला वक्त भी मेरे इस यकीन की पुष्टि करेगा.

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